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आपका अपना - तन्वीर

Sunday, 28 September 2014

कन्या-पूजन (कविता)

नवरात्री पर कन्या पूजन करना हमारी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण पक्ष है. हमारे देश में
आज एक तरफ इसी संस्कृति का निर्वाह किया जा रहा है. वही दूसरी तरफ नर पिशाच
नारी से घिनौना काम करते है..नारी को बेइज्जत करते है.इसी विषय पर पंजाब यूनिवर्सिटी
चंडीगढ़ की असि.लाईब्रेरियन सुश्री  मोना पाल "वैष्णवी" जी कि लिखी एक बेहतरीन कविता
में उन्होंने इस पीड़ा को व्यक्त किया है.उनकी इस कविता को साभार उनके
ब्लॉग monapall.blogspot.com से यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ.

उनके निजी ब्लॉग का लिंक -  http://monapall.blogspot.in/2014/09/blog-post_31.html
      
कन्या-पूजन (कविता)

भारत जैसे देश में,
जहाँ माँ दुर्गा पूजी जाती है,
नवरात्र त्यौहार मनाया जाता है
फिर क्यों ऐसे देश में
कन्या-पूजन का
उपहास उड़ाया जाता है???

कन्या तो माँ का रूप है,
शक्ति का स्वरूप है,
पहले उसकी पूजा होती है,
उसे पहले खाना खिलाया जाता है,
फिर क्यों ऐसे देश में,
कन्या को ग्रास बनाया जाता है,
कन्या-पूजन का
उपहास उड़ाया जाता है???

कन्या में तो माँ बसती है,
वह हँस दे तो, किस्मत हँसती है,
हम कंजक पूजन करते हैं,
उसका सम्मान करते हैं,
उसे चुनरिया ओढ़ा कर,
फिर क्यों उसे,
उसी चुनरी से बेज़ार कराया जाता है
फिर क्यों ऐसे देश में,
कन्या पूजन का
उपहास उड़ाया जाता है???

कंजक के दर्शन तो,
सम्पन्नता की निशानी है,
कन्या-पूजन की महिमा से तो,
दुनिया आनी-जानी है,
फिर क्यों उसके संग
दुष्कर्म करके,
देश को, शरमोसार कराया जाता है
फिर क्यों ऐसे देश में,
कन्या-पूजन का
उपहास उड़ाया जाता है???
*************************
मोना पाल "वैष्णवी"
असि. लाईब्रेरियन
पंजाब विश्वविद्यालय
चंडीगढ़
ईमेल: monapall.chd@gmail.com



Saturday, 26 July 2014

क़िताबें

क़िताबें

यूँ ही ना समझो
इन किताबों को
इनमे है जीवन सार.

हर अक्षर अक्षर  में है ब्रह्मा.
हर शब्द  - शब्द  में है विष्णु .
शब्दों के हर गूढ़ रहस्यों में
है अस्तित्व शिव का..

शिव ही सत्य है.
शिव ही सुन्दर है
शिव ही आत्मानन्द  है

यही रहस्य जीवन का
छुपा है इन किताबों में.

आदि से अनादी तक
भूत से वर्तमान तक
वर्तमान से भविष्य तक
इनका ही वर्चस्व है
इनमे ही ज्ञान सर्वस्व है....

आदम से आदमी तक
और आदमी से परमानन्द  तक
गीता- कुरआन- बाइबल
वेद- उपनिषद और ये साहिबे ग्रन्थ तक
ईश्वर के उपदेशों
दया धर्म मार्ग की संवाहक है
ये क़िताबें ..

बचपन में
माँ सा वात्सल्य  देती
यौवन में प्रेयसी सा प्यार
और बुढ़ापे  में
साथी सा सहारा देती है
ये क़िताबे ....

हर घनघोर  अँधेरी राह में
प्रकाश दिखाती है
ऊँगली थामें जीवन की
हमारा साथ निभाती है
ज्ञान  भरी
ये क़िताबें...

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                                              Tarun k. soni Tanveer 

Friday, 23 May 2014

पिता



पिता


उस इंसान की

 इबादत उसकी दुआओं का 

फल हूँ मै.


जिसने मुझे बनाया

उसकी छाया

उसका प्रतिरूप हूँ मै..


वो अथाह सागर है

महज 

एक कतरा ही हूँ मै.


फिर क्यूँ 

समझते हो

महान मुझे ?


महान ! मै नहीं !


वो इन्सान है

जिनकी संतान हूँ मै..

******************

तरुण कु. सोनी तन्वीर

Wednesday, 21 May 2014

भारत : कल और आज

भारत : कल और आज
सत्ता के गलियारे में
चल रहा है
भारत.

आरक्षण की आग में
जल रहा है
भारत .

लुट खसोट का जोर है
लुट तंत्र में छल रहा है
भारत

दल बदल राजनीति के दौर में
पल पल बदल रहा है
भारत
कभी संस्कृति के उदयांचल को चल रहा था
आज अस्तांचल को चल रहा है
भारत ..
********************  
                                                तरुण कु. सोनी तन्वीर
                                               

Sunday, 18 May 2014

खुनी समर (कविता-7)


खुनी समर


रचे जाते है 
आज चहुँ ओर
कहीं ना कहीं
किसी दस्यु के हाथो
दुष्काण्ड ..

लगे रहते है
लगाकर घात
तिमिर पुत्र बनकर
खड़े रहते है
व्याध्र !

मंदिर और मस्जिद के बीच
हिन्दू- और मुसलमान के बीच
खोद रहे है खाइयाँ
पनप रहे है
नित नये समर.

फ़ैल रहा है  जिनसे
हलाहल
 दिग-दिगन्तो में
जो गाद रहा है
वकृ  के पंजे..

बंदिनी बन रही है
फिर से
काले स्याह
आतंक के तिमिर कारा  में.
आज स्वतन्त्रता .

फ़ैल रहा है
आज
मनुज भक्षी
मनुजो के ही  हाथों
ये खुनी समर...!!
*********************
(c)  तरुण कु. सोनी "तन्वीर"


Monday, 21 April 2014

आलेख - 2. परिवर्तन ही जीवन है

2. परिवर्तन ही जीवन है

                   हमारा ये सांसारिक जीवन ओस की बूदों की तरह है। जो चन्द क्षणो के लिए अस्तित्व में रहता है। और चन्द क्षणों बाद ही पुनः प्रकृति में विलिन हो जाता है। इस सुन्दर काया को जिसे हम अनमोल समझ रहे हैं। इसे एक न एक दिन खाक में (पंचतत्व) में विलीन होना हि पड़ेगा।तो क्यों ना हम कोई ऐसा काम करें, जिससे समाज व राष्ट्र का भला हो और जिसे जमाना याद करें।

               जैसे हमें हमारे पूर्वजों ने बहुत कुछ दिया है। घर-परिवार, जमीन-जायदाद, और सुसंस्कृत सभ्रांत समाज आदि। जो आज हमारी पहचान है। उन्हीं की भांति हमें भी हमारी आने वाली पीढ़ी को कुछ न कुछ देना ही होगा। किन्तु अब वो जमाना नही रहा की हम हमारे पूर्वजों द्वारा बनाये गये उन पुराने रीति-रिवाजों का पूर्णतया निर्वाह सकें।

             आज इस इक्कीसवी सदी में बढ़ती जनसंख्या, मंहगाई, नित नई तकनीकों और प्रतिस्पद्धांओं के हम उस पुरानी लीक पर चलकर कभी उन्नति नहीं कर सकते है। उन पुरानी तकनीकों के आधार पर हम अपने कुल, समाज व राष्ट्र को नई दिशा नहीं दे सकते है।

            जिस प्रकार प्रकृति का श्रृंगार सदा ताजा खिले सुगन्धित पुष्पों, वृक्षों, लताओं आदि से होता है और वे ही पृथ्वी के यौवन को पतझड़ की नीरसता से दूर कर नई नवेली दुल्हन की भांति सजाती-सवांरती है। अर्थात समय परिवर्तन के साथ ही प्रकुति में भी परिवर्तन होता है।
ठीक इसी प्रकार हमें भी परिवर्तन को अपनाना होगा।                                                                       
              पुरानी तकनीकों को छोड़कर नई तकनीकों को छोड़कर नई तकनीकों का विकास करना होगा। घर-परिवार व समाज में प्रेम-एकता सौहार्द व  सदभावना का संचार करना      
 होगा। माहौल बनाना होगा। एक दूसरे के प्रति भाईचारे की भावना पैदा करनी होगी। परस्पर सहयोगी बनाना होगा। परिवर्तन को अपनाना होगा।

                            तकि हमारा, समाज व राष्ट्  सबका उत्थान हो सके। परिवर्तन तो समय प्रकृति व मानव जाति का एक अटल नियम है जिसका निर्वाह हमें सोच समझ कर करना चाहिए। ऐसा नही ही हम परिवर्तन की दौड़ में अंधे में होकर अपने मौलिक कर्तव्य भी दर किनारे कर दे। यह सही है कि नई वस्तु को प्राप्त करने के लिए कुछ हद तक पुरानी वस्तुओं को त्यागना अवश्य  पड़ता है, जो कि आज की स्थिति में अप्रासंगिक है, केवल उन्हीं वस्तुओं का मोह छोड़ना आवश्यक हैं।
                         आधुनिकता की होड़ में अपने सांस्कृतिक व पारिवारिक कर्तव्यों को त्यागना  अकर्मण्यता व मूर्खता ही है। इससे हमारा स्वयं का ही पतन होता है। इसलिए हमें  यह स्मरण रखना जरूरी है की हमारी ये मानव देह एक जलती हुई मशाल है। जो निरन्तर कुल, समाज, राष्ट्र व सम्पूर्ण विश्व को अपने प्रकाश से आलोकित कर उसका मार्गदर्शन करती है। 

                       अतः हमारा ये जीवन निष्प्रायोजन नहीं होना चाहिए। समाज के लिए हमें कर्मठ, ओजस्वी , सहायक परिवर्तनशील व अभिलाषी होना चाहिए। ताकि हमारी इस मशाल रूपी देह के प्रकाश से समाज व राष्ट्र आलोकित हो सके और हमारा ये मानव जीवन सार्थक हो सके।
अतः याद रखेंः- जो उत्कृष्ट प्रतिमाएँ होती है वे ही अनिवार्यत पहले से ही चली आ रही लीक को तोडती है और अपनी नई लीक बनाती है नया इतिहास लिखती है।
अर्थात परिवर्तन ही जीवन है।
                       
                     लीक-लीक गाडी चलै, लीक ही चले कपूत।
                       ये तीनो उल्टे चलै, शायर, सिंह, सपूत।।
                                 *****************         
                    तरुण कु. सोनी तन्वीर 
     ईमेल-  tarunksoni.tanveer@gmail.com
          वेब साईट - www.nanhiudaan.blogspot.com

Thursday, 17 April 2014

प्रेरक लेख- 1. पुरूषार्थी बनो

1. पुरूषार्थी बनो


जिन खोजो तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।

अर्थात जिसने गहरे पानी में उतरकर खोज की है, उसे मोती अवश्य मिले हैं।



यानी जो इंसान अपने लक्ष्यों को बड़े गहरे मनोयोग से तलाशता है। उन्हें पाने को कठोर परिश्रम करता है। एक नें एक दिन उसे अपनी मेहनत का प्रतिफल अवश्य मिलता है।किन्तु जो डूबने के भय मात्र से जल की ऊपरी सतह पर ही हाथ-पांव मारता है। तैरने के लिए परिश्रम नहीं करता है। अर्थात बड़े लक्ष्यों को पाने की कोरी कल्पनाएं ही करता रहता है। उस इंसान को कभी सफलता रूपी वो बेशकीमती मोती नहीं मिल पाता है, जो उस इंसान को एक नया मुकाम देता है। ऐसा नहीं है कि उसे कुछ भी नहीं मिलता है। उसे भी मिलता है। किन्तु वही जो जीतने वाले छोड़ देते हैं। जिनकी अहमियत मात्र भोजन करने के बाद उस झूठन जितनी ही होती है, जो भोजन करने वाला छोड़ देता है।

इंसान का अपने जीवन के प्रति दृष्टिकोण स्वयं के सामर्थ्यनुसार निर्धारित करता है एवं मानव जीवन पर मात्र दो प्रकार के दृष्टिकोण ही लागू होते हैं। पहला भाग्यवादी दृष्टिकोण दूसरा पुरूषार्थी दृष्टिकोण। जो महज भाग्य पर भरोसा करतें, कर्म पर नहीं, वो मनुष्य भाग्यवादी है। और जो भाग्य पर कम और कर्म पर अधिक भरोषा करता है, वह मनुष्य पुरूषार्थी है। जो भाग्यवादी है, वह कायर है। वो संघर्ष से डरता है। उसे अपने प्राण अत्यधिक प्रिय लगते हैं। वो जीवन का खतरा उठाने में झिझकता है। वह संघर्ष की हर स्थिति में पलायन कर जाता है।



अक्सर कायर व्यक्ति ये निष्कर्ष निकाल लेता है कि जीवन में जो कुछ भी उपलब्धियां मिलती है, वो कर्म से नहीं सिर्फ भाग्य से ही मिलती है। इसी कारण भाग्यवादी इंसान सअैव जीवन के हर क्षेत्र में असफल रहता है।



किन्तु जो पुरूषार्थी है, वो वीर है। उनकी हर बातें भाग्यवादी इंसान के विपरीत अपने वीरत्व, अपनी शक्ति एवं साहस केे बलबूते पर जीवन के हर संग्राम में कूद पड़ता है। वह अपने जीवन की तनिक भी चिन्ता न कर, अपनी आन-बान-सान मिटने के लिए तत्पर रहता है।

अपने वीरत्व के बलबूते पर वो उन उपलब्धियों (लक्ष्यों) को भी प्राप्त कर लेता है, जो प्रायः दिखने और सोचने में असंभव से लगते है। वीर, जीत कर भी जीतता है और हार कर भी जीतता है। क्योकिं वीर पुरूष ये जानते हैं कि हाथ पर हाथ रखकर बैठने से कुछ भी प्राप्त नहीं होता है। जो कुछ भी मिलता है, वो प्राणो की बाजी लगाकर जीवन संग्राम में कूदने से ही मिलता है।



राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा हैः-

प्रकृति नहीं डर कर झुकती है, कभी भाग्य के बल से।

सदा हारती वह मनुष्य के उधम से, श्रमजल से।।



अर्थात जीवन की उपलब्धियों का आधार पुरूषार्थ है, भाग्य नहीं। भाग्यवाद तो पाप का आवरण है, जो पाप को बढ़ावा देता है। अतः पुरूषार्थी बनो। भाग्यवादी नहीं।



याद रखेः- जो समय को दे चुनौती वीर होते हैं,

मृत्यु से खाते न भय, रणधीर होते हैं।

देश रजनीज शीश पर चन्दन समझ धरते,

सत्य वे ही देश की तकदीर होते हैं।

****************
(c)... तरुण कु. सोनी तन्वीर
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ग़ज़ल-6- मंज़र

मंजर  
सर पे कफन जुबां पे सच रखतें हैं..
इन्सा से नहीं खुदा से डर रखतें हैं..

बात पहुँचे सदा हर दिल तक हमारी,
आवाज में हम ऐसा असर रखते हैं..

खारों के इस बियाबान जंगल में हम
दिल में उल्फत का शजर रखतें हैं..

वक्त पे इन्कलाब लाने को शमशीरें नहीं,
हाथों में अपने हम कलम रखतें हैं..

जाने कब जरूरत आ पड़े वतन को,
जान कब हम हथेली पर रखतें हैं..

औरों को दर्द देना अपनी आदत नहीं,
पीर गैरों की जाने वो दर्दे-जिगर रखते हैं..

जाने कब कहां कोई जरूरत आ पड़े,
नजरों में हम हर-एक मंजर रखते हैं..

अंधेरे क्या खाक मिटायेंगें हमको,
दिल में रोशनीं-ए-सहर रखतें हैं..

बड़ा सताया है सियासतों ने गरीबों को,
आओ! बेघरों के सर हम घर रखतें है..

अंधेरें से जो न निकल पाये हैं कभी
घरों में उनके हम तन्वीर रखतें हैं..
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  निदा-ए- तन्वीर
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(c)... तरुण कु. सोनी तन्वीर
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ग़ज़ल-5 - हसरत

हसरत

राह में खड़ी दीवारें गिर जाएं,
दिल से दिल फिर मिल जाएं..

डाली  है  मतभेदों  ने जो दरारे,
 प्यार के मरहम से वो मिट जाएं..

तमाम  उम्र  जिसकी ख्वाहिश रही,
 खुदा करें! एक नजर वो दिख जाए..

बद्दुआओं के सहारे कटी है जिन्दगी,
 आखिरी दौर में एक दुआ मिल जाए..

कि वो आएं, उनका दामन उलझे,
और  मेरी  हसरत पूरी हो जाए..
                                        
                                                 ****************** 
    निदा-ए-तन्वीर 
   ******************
    (c)... तरुण कु. सोनी तन्वीर
    ईमेल- tarunksoni.tanveer@gmail.com
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ग़ज़ल-4- हालात

हालात 

हालात जो मेरे कल गमगीन हो गये
  रिश्तों की सारी तासीर बदल गई..

आके जो टकराया शीशमहल से पत्थर,
 महल-ए-जीस्त की तामीर बदल गई..

सारा कुसुर औ खताऐं मेरे सर आई
बंद लिफाफे से जो तस्वीर बदल गई..

आजमाया है हवाओं ने अपना जोर
सहरा में कल की प्राचीन बदल गई..

निकला था घर से राहें मंजिल पर ही
जाने कैसे ख्वाबों की ताबीर बदल गई..

बैठा रहा मैं अब तलक जिसकी राह में
वहीं मौत मेरी राह-आखिर बदल गई..
                                                           ********************
                                                                   निदा - ए- तन्वीर
                                                           ********************
                                                       (c) तरुण कु. सोनी "तन्वीर"
                                                ईमेल- tarunksoni.tanveer@gmail.com

                                                

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