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Monday, 24 February 2014

जीत (कविता-2)



मात्र दो अक्षरो का संयोग है
’जीत’।
छोटा है मगर
बड़ा ही अद्भुत शब्द है ’जीत’।
सारी दुनिया को यह
अपने पीछे भागता है
छुड़ा कर
 निशा
दिवस से
बढ़ाता है ’प्रीत’।
हर कोई पाना चाहता है इस को
चाहे वह राजा या रंक हो
या हो स्वयं ’अभिजीत’।
पर यह सबके हाथ नहीं आता
ऐसा भी नहीं है
कि यह पकड़ा नहीं जाता।
इसे तो वही कर्मवीर पाता है
जो आशा/निराशा
सफलता/असफलता
सुख/दुःख से परे हट
निरन्तर अपने कदम
मंजिल की ओर बढ़ता है।
अपने लक्ष्य को तय करने में
लगन लगाता है।
एक दिन वही कर्मवीर
जीवन की हर बाधाओं
तमाम असफलताओं
को पार कर पाता है।
जाता है जीत ।



****************


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