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Saturday, 8 March 2014

स्वर्णिम इतिहास (कविता-4)


शब्दों की चित्कारों में
की जाती हैं
आज
किसी-न-किसी
धर्म की तलाश ।
भरी जाती है गोद
धरती माँ की
उसकी ही सन्तानों के
नर-शिशु कंकालों से
और
ढो दी जाती है
आतंकवाद के कांधों पर
मानवता की लाश

पैदा कर दी गई
आज
चहुँ और
(भयाक्रांत करने हेतु)
युद्धों की विभीषिकाएँ 
धरती-पाताल हो या आकाश ।

अब कभी-कभी ही,
कहीं-कहीं ही,
सुनाई देते है,
आरती और अजानों के स्वर ।

शंखनाद की जगह
गुंजता है
चित्कारों का गुंजन
और
जलता दिखाई देता है
गिरजाघर में जलती
मोमबत्तीयों सा
हर शहर।

क्या यहीं होगा ?
कल हमारा स्वर्णिम इतिहास !!!
*******************
                                                                       " तन्वीर "

कविता (कविता-3)


टुट चुका है आज
सब कुछ
जो कुछ भी था
अब तक
मेरे भीतर!
बचा है अगर कुछ
तो बस.....
चलती-फिरती जिन्दा लाश
पेट्रोल की भांति
जलता रक्त
और
वेदना का धुआँ छोड़ती
श्वासे 
और
दबी जुबाने से
सिसकियाँ भरती
आवाजें !!
बस.....अब यहीं बचा हैं
मेरे भीतर..
और 
कह सकते हो
मेरी इन्हीं
गुंगी-बहरी-सी
सिसकियों कों
तुम!
कविता !!!
*************

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