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Saturday, 8 March 2014

कविता (कविता-3)


टुट चुका है आज
सब कुछ
जो कुछ भी था
अब तक
मेरे भीतर!
बचा है अगर कुछ
तो बस.....
चलती-फिरती जिन्दा लाश
पेट्रोल की भांति
जलता रक्त
और
वेदना का धुआँ छोड़ती
श्वासे 
और
दबी जुबाने से
सिसकियाँ भरती
आवाजें !!
बस.....अब यहीं बचा हैं
मेरे भीतर..
और 
कह सकते हो
मेरी इन्हीं
गुंगी-बहरी-सी
सिसकियों कों
तुम!
कविता !!!
*************

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