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Thursday, 17 April 2014

प्रेरक लेख- 1. पुरूषार्थी बनो

1. पुरूषार्थी बनो


जिन खोजो तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।

अर्थात जिसने गहरे पानी में उतरकर खोज की है, उसे मोती अवश्य मिले हैं।



यानी जो इंसान अपने लक्ष्यों को बड़े गहरे मनोयोग से तलाशता है। उन्हें पाने को कठोर परिश्रम करता है। एक नें एक दिन उसे अपनी मेहनत का प्रतिफल अवश्य मिलता है।किन्तु जो डूबने के भय मात्र से जल की ऊपरी सतह पर ही हाथ-पांव मारता है। तैरने के लिए परिश्रम नहीं करता है। अर्थात बड़े लक्ष्यों को पाने की कोरी कल्पनाएं ही करता रहता है। उस इंसान को कभी सफलता रूपी वो बेशकीमती मोती नहीं मिल पाता है, जो उस इंसान को एक नया मुकाम देता है। ऐसा नहीं है कि उसे कुछ भी नहीं मिलता है। उसे भी मिलता है। किन्तु वही जो जीतने वाले छोड़ देते हैं। जिनकी अहमियत मात्र भोजन करने के बाद उस झूठन जितनी ही होती है, जो भोजन करने वाला छोड़ देता है।

इंसान का अपने जीवन के प्रति दृष्टिकोण स्वयं के सामर्थ्यनुसार निर्धारित करता है एवं मानव जीवन पर मात्र दो प्रकार के दृष्टिकोण ही लागू होते हैं। पहला भाग्यवादी दृष्टिकोण दूसरा पुरूषार्थी दृष्टिकोण। जो महज भाग्य पर भरोसा करतें, कर्म पर नहीं, वो मनुष्य भाग्यवादी है। और जो भाग्य पर कम और कर्म पर अधिक भरोषा करता है, वह मनुष्य पुरूषार्थी है। जो भाग्यवादी है, वह कायर है। वो संघर्ष से डरता है। उसे अपने प्राण अत्यधिक प्रिय लगते हैं। वो जीवन का खतरा उठाने में झिझकता है। वह संघर्ष की हर स्थिति में पलायन कर जाता है।



अक्सर कायर व्यक्ति ये निष्कर्ष निकाल लेता है कि जीवन में जो कुछ भी उपलब्धियां मिलती है, वो कर्म से नहीं सिर्फ भाग्य से ही मिलती है। इसी कारण भाग्यवादी इंसान सअैव जीवन के हर क्षेत्र में असफल रहता है।



किन्तु जो पुरूषार्थी है, वो वीर है। उनकी हर बातें भाग्यवादी इंसान के विपरीत अपने वीरत्व, अपनी शक्ति एवं साहस केे बलबूते पर जीवन के हर संग्राम में कूद पड़ता है। वह अपने जीवन की तनिक भी चिन्ता न कर, अपनी आन-बान-सान मिटने के लिए तत्पर रहता है।

अपने वीरत्व के बलबूते पर वो उन उपलब्धियों (लक्ष्यों) को भी प्राप्त कर लेता है, जो प्रायः दिखने और सोचने में असंभव से लगते है। वीर, जीत कर भी जीतता है और हार कर भी जीतता है। क्योकिं वीर पुरूष ये जानते हैं कि हाथ पर हाथ रखकर बैठने से कुछ भी प्राप्त नहीं होता है। जो कुछ भी मिलता है, वो प्राणो की बाजी लगाकर जीवन संग्राम में कूदने से ही मिलता है।



राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा हैः-

प्रकृति नहीं डर कर झुकती है, कभी भाग्य के बल से।

सदा हारती वह मनुष्य के उधम से, श्रमजल से।।



अर्थात जीवन की उपलब्धियों का आधार पुरूषार्थ है, भाग्य नहीं। भाग्यवाद तो पाप का आवरण है, जो पाप को बढ़ावा देता है। अतः पुरूषार्थी बनो। भाग्यवादी नहीं।



याद रखेः- जो समय को दे चुनौती वीर होते हैं,

मृत्यु से खाते न भय, रणधीर होते हैं।

देश रजनीज शीश पर चन्दन समझ धरते,

सत्य वे ही देश की तकदीर होते हैं।

****************
(c)... तरुण कु. सोनी तन्वीर
ईमेल- tarunksoni.tanveer@gmail.com
वेब ब्लॉग - http://nanhiudaan.blogspot.com

8 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (17-04-2014) को "गिरिडीह लोकसभा में रविकर पीठासीन पदाधिकारी-चर्चा मंच 1584 में अद्यतन लिंक पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन मुस्कुराते रहिए... फ़टफ़टिया बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
    Replies
    1. मेरी ब्लॉग पोस्ट को मुस्कुराते रहिए... फ़टफ़टिया बुलेटिन में शामिल करने हेतु आपका हार्द्धिक आभार सर जी,

      Delete
  3. Replies
    1. नमस्ते रश्मि दीदी, हार्द्धिक आभार.

      Delete

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