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Monday, 14 April 2014

ग़ज़ल-2 - वो दौर और था




मतलब के है आज सारे रिश्ते यहां,
वफाओं की चलन का, वो दौर और था..


फेंकते हैं फूलों को मसल कर सभी यहां,
गुलदान में सजाने का वो दौर और था..


क्या कदर है अब मेरे खतों की सनम
किताबों में छुपाने का वो दौर और था..

हुस्न वाले नहीं अब वफा के लायक
उल्फत में मिटने का वो दौर और था..

मिटाती है आदमी को औरत ही आज
आदमी को बनाने का वो दौर और था..

सिकन्दर है अब मुकद्दर मेरे
मेरी शिकस्तों का वो दौर और था..

******************

निदा-ए-तन्वीर 
   ********************

ग़ज़लकार - (c)... तरुण कु. सोनी तन्वीर
ईमेल- tarunksoni.tanveer@gmail.com
वेब ब्लॉग - http://nanhiudaan.blogspot.com

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