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Monday, 21 April 2014

आलेख - 2. परिवर्तन ही जीवन है

2. परिवर्तन ही जीवन है

                   हमारा ये सांसारिक जीवन ओस की बूदों की तरह है। जो चन्द क्षणो के लिए अस्तित्व में रहता है। और चन्द क्षणों बाद ही पुनः प्रकृति में विलिन हो जाता है। इस सुन्दर काया को जिसे हम अनमोल समझ रहे हैं। इसे एक न एक दिन खाक में (पंचतत्व) में विलीन होना हि पड़ेगा।तो क्यों ना हम कोई ऐसा काम करें, जिससे समाज व राष्ट्र का भला हो और जिसे जमाना याद करें।

               जैसे हमें हमारे पूर्वजों ने बहुत कुछ दिया है। घर-परिवार, जमीन-जायदाद, और सुसंस्कृत सभ्रांत समाज आदि। जो आज हमारी पहचान है। उन्हीं की भांति हमें भी हमारी आने वाली पीढ़ी को कुछ न कुछ देना ही होगा। किन्तु अब वो जमाना नही रहा की हम हमारे पूर्वजों द्वारा बनाये गये उन पुराने रीति-रिवाजों का पूर्णतया निर्वाह सकें।

             आज इस इक्कीसवी सदी में बढ़ती जनसंख्या, मंहगाई, नित नई तकनीकों और प्रतिस्पद्धांओं के हम उस पुरानी लीक पर चलकर कभी उन्नति नहीं कर सकते है। उन पुरानी तकनीकों के आधार पर हम अपने कुल, समाज व राष्ट्र को नई दिशा नहीं दे सकते है।

            जिस प्रकार प्रकृति का श्रृंगार सदा ताजा खिले सुगन्धित पुष्पों, वृक्षों, लताओं आदि से होता है और वे ही पृथ्वी के यौवन को पतझड़ की नीरसता से दूर कर नई नवेली दुल्हन की भांति सजाती-सवांरती है। अर्थात समय परिवर्तन के साथ ही प्रकुति में भी परिवर्तन होता है।
ठीक इसी प्रकार हमें भी परिवर्तन को अपनाना होगा।                                                                       
              पुरानी तकनीकों को छोड़कर नई तकनीकों को छोड़कर नई तकनीकों का विकास करना होगा। घर-परिवार व समाज में प्रेम-एकता सौहार्द व  सदभावना का संचार करना      
 होगा। माहौल बनाना होगा। एक दूसरे के प्रति भाईचारे की भावना पैदा करनी होगी। परस्पर सहयोगी बनाना होगा। परिवर्तन को अपनाना होगा।

                            तकि हमारा, समाज व राष्ट्  सबका उत्थान हो सके। परिवर्तन तो समय प्रकृति व मानव जाति का एक अटल नियम है जिसका निर्वाह हमें सोच समझ कर करना चाहिए। ऐसा नही ही हम परिवर्तन की दौड़ में अंधे में होकर अपने मौलिक कर्तव्य भी दर किनारे कर दे। यह सही है कि नई वस्तु को प्राप्त करने के लिए कुछ हद तक पुरानी वस्तुओं को त्यागना अवश्य  पड़ता है, जो कि आज की स्थिति में अप्रासंगिक है, केवल उन्हीं वस्तुओं का मोह छोड़ना आवश्यक हैं।
                         आधुनिकता की होड़ में अपने सांस्कृतिक व पारिवारिक कर्तव्यों को त्यागना  अकर्मण्यता व मूर्खता ही है। इससे हमारा स्वयं का ही पतन होता है। इसलिए हमें  यह स्मरण रखना जरूरी है की हमारी ये मानव देह एक जलती हुई मशाल है। जो निरन्तर कुल, समाज, राष्ट्र व सम्पूर्ण विश्व को अपने प्रकाश से आलोकित कर उसका मार्गदर्शन करती है। 

                       अतः हमारा ये जीवन निष्प्रायोजन नहीं होना चाहिए। समाज के लिए हमें कर्मठ, ओजस्वी , सहायक परिवर्तनशील व अभिलाषी होना चाहिए। ताकि हमारी इस मशाल रूपी देह के प्रकाश से समाज व राष्ट्र आलोकित हो सके और हमारा ये मानव जीवन सार्थक हो सके।
अतः याद रखेंः- जो उत्कृष्ट प्रतिमाएँ होती है वे ही अनिवार्यत पहले से ही चली आ रही लीक को तोडती है और अपनी नई लीक बनाती है नया इतिहास लिखती है।
अर्थात परिवर्तन ही जीवन है।
                       
                     लीक-लीक गाडी चलै, लीक ही चले कपूत।
                       ये तीनो उल्टे चलै, शायर, सिंह, सपूत।।
                                 *****************         
                    तरुण कु. सोनी तन्वीर 
     ईमेल-  tarunksoni.tanveer@gmail.com
          वेब साईट - www.nanhiudaan.blogspot.com

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (22-04-2014) को ""वायदों की गंध तो फैली हुई है दूर तक" (चर्चा मंच-1590) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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