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Monday, 14 April 2014

ग़ज़ल- 3 - दर्द की रवानी



मैंने आज अपने दर्द की  रवानी लिखी है..
बड़ी मुश्किल से दिल की कहानी लिखी है..

पानी को पानी की तासिर बताकर,
आज अपनी मौत पर जिंदगानी लिखी है..

चुराये है अक्सर मैंने आंसू तेरी आंखों से
 होठों पर तुम्हारे ही मैंने हंसी लिखी है..

फुलों में ठनी थी कल हंसते तुम्हे देखकर
  आज फूलों की मैंने वो बेईमानी लिखी है..

खुशनुमा वक्त था जब साथ तुम्हारा था
   तन्हाइयों में मैंने आलम की बेबसी लिखी है..
****************
(निदा-ए-तन्वीर)
*****************
ग़ज़लकार - (c)... तरुण कु. सोनी तन्वीर
ईमेल- tarunksoni.tanveer@gmail.com
वेब ब्लॉग - http://nanhiudaan.blogspot.com

7 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज सोमवार (14-04-2014) के "रस्में निभाने के लिए हैं" (चर्चा मंच-1582) पर भी है!
    बैशाखी और अम्बेदकर जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    Replies
    1. सर जी सादर प्रणाम, आपका हार्द्धिक आभारी हूँ की आपने मुझे एक सशक्त मंच प्रदान किया...

      Delete
  2. मैंने आज अपने दर्द की रवानी लिखी है..
    बड़ी मुश्किल से दिल की कहानी लिखी है..

    पानी को पानी की तासिर बताकर,
    आज अपनी मौत पर जिंदगानी लिखी है..

    चुराये है अक्सर मैंने आंसू तेरी आंखों से
    होठों पर तुम्हारे ही मैंने हंसी लिखी है..

    फुलों में ठनी थी कल हंसते तुम्हे देखकर
    आज फूलों की मैंने वो बेईमानी लिखी है..

    खुशनुमा वक्त था जब साथ तुम्हारा था
    तन्हाइयों में मैंने आलम की बेबसी लिखी है..
    ****************
    (निदा-ए-तन्वीर)
    *****************
    ग़ज़लकार - (c)... तरुण कु. सोनी तन्वीर
    ईमेल- tarunksoni.tanveer@gmail.com
    वेब ब्लॉग - http://nanhiudaan.blogspot.com
    बढ़िया ग़ज़ल कही है -आज फूलों की मैंने वो बे -ईमानी लिखी है।

    एक दीवार पे चाँद टंका था ,

    मैं ये समझा तुम बैठी हो ,

    उजले उजले फूल खिले थे ,

    जैसे तुम बाते करती हो।

    ReplyDelete
  3. आपकी लिखी पंक्तिया बेहद खुबसूरत है.
    सदा आशीर्वाद यू ही बनाये रखे.

    ReplyDelete
  4. apki ghazal se muttasir hokar=
    sari duniya ka ranjo gham lekar,
    hai dil mera ki muskurata hai .

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