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आपका अपना - तन्वीर

Thursday, 17 April 2014

ग़ज़ल-6- मंज़र

मंजर  
सर पे कफन जुबां पे सच रखतें हैं..
इन्सा से नहीं खुदा से डर रखतें हैं..

बात पहुँचे सदा हर दिल तक हमारी,
आवाज में हम ऐसा असर रखते हैं..

खारों के इस बियाबान जंगल में हम
दिल में उल्फत का शजर रखतें हैं..

वक्त पे इन्कलाब लाने को शमशीरें नहीं,
हाथों में अपने हम कलम रखतें हैं..

जाने कब जरूरत आ पड़े वतन को,
जान कब हम हथेली पर रखतें हैं..

औरों को दर्द देना अपनी आदत नहीं,
पीर गैरों की जाने वो दर्दे-जिगर रखते हैं..

जाने कब कहां कोई जरूरत आ पड़े,
नजरों में हम हर-एक मंजर रखते हैं..

अंधेरे क्या खाक मिटायेंगें हमको,
दिल में रोशनीं-ए-सहर रखतें हैं..

बड़ा सताया है सियासतों ने गरीबों को,
आओ! बेघरों के सर हम घर रखतें है..

अंधेरें से जो न निकल पाये हैं कभी
घरों में उनके हम तन्वीर रखतें हैं..
******************
  निदा-ए- तन्वीर
************************
(c)... तरुण कु. सोनी तन्वीर
ईमेल- tarunksoni.tanveer@gmail.com
वेब ब्लॉग - http://nanhiudaan.blogspot.com

2 comments:

  1. andhere kya khak mitayenge hamko,
    dil me raushni a sahar rakhren hain.
    umda ghazal ki khubsurat sher,badhai.

    ReplyDelete

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