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Saturday, 12 April 2014

महाभारत (कविता-5)



महाभारत

समरक्षेत्र से भाग गया
कलियुगी धनुर्धर
छोड़ के अपना तरकस
ढीले पड़े हैं उसके
 धनुष के सारे कस .

टूटे पड़े है 
अन्तस्तल में 
       वह्नि के शर ।        

लुटती रह गई बीच सभा में
द्रोपदी !
देखता रह गया
होकर वो निर्लज्ज।

कर लिया है उसने धारण,
निर्लज्जता का
तिमिरयुक्त वसन।

भूल गया उपदेश
श्री कृष्ण के

बह गया वो
अकर्मण्यता-विलासिता
और वासना के सागर में।

इसीलिए
नहीं रचा जाता है
धर्म युद्व के लिए
अब फिर से
कोई ’महाभारत’।
******************
                                                               
                                                             तरुण कु. सोनी तन्वीर

                                                   

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