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Saturday, 12 April 2014

विचलित जिन्दगी (कविता-6)


पानी पर तैरती
कागज की नाव
या हवा में उड़ते
चिड़िया के नन्हें से
पंख की तरह
भ्रमित है / विचलित है
ये जिन्दगी मेरी

कभी रूकती है
कभी चलती है
कभी-कभी
संघर्ष की लहरों में
गम के भंवर में
लहरा कर यूं फंस जाती है।

जैसे काँटे में मछली फंसती जाती है।

कभी-कभी
ये जिन्दगी मेरी
किनारे पर आकर
पुनः
गन्तव्य की ओर लौट जाती है ।

जैसे कुछ भूल आई हो
इस स्वप्नील संसार में।
                                                                            
शायद !
ये मोह-माया के
जाल में फँस गई है।
**************
(स्वप्नीलः- काल्पनिक अथवा सपने जैसी)
*************
  तरुण कु. सोनी तन्वीर 



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