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आपका अपना - तन्वीर

Saturday, 12 April 2014

आओ प्रिये! आओ (गीति काव्य-6)

आओ प्रिये ! आओं
फिर रात ढली
फिर चाँद पुकारे
ज्यों रोशनी को
चिराग तरसे
  यों तुम्हारी याद में
नैन बरसे।।

आओ प्रिये ! आओ
दिल की हर धड़कन
तुम्हें पुकारे ।।

तुम्हारी छुअन से मिलती
नई चेतना मुझको ।
                                           
  नेह में डूबी हुई
नई प्रेरणा मुझको ।
वही चिर-परिचित सम्बल,
वही तुम्हारा अहसास,
और सम्वेदना
आज भी
दिल में महफूज है
आओ प्रिये ! आओ
मेरी सम्वेदना
                             तुम्है पुकारे ।।                           

शब्द सुगन्ध औ स्पर्श की
कल्पना में नहाई रोशनाई
और रात के धुंधलके में
चाँदनी की भाँति
प्रिये ! मुझे तुम्हारी जरूरत है
आओ प्रिये ! आओ
श्वासों का नेह-बन्धन
तुम्हें पुकारे ।।
आओ प्रिये! आओ.......।।
*********************
                                                               तरुण कु. सोनी "तन्वीर"



                                                            

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (12-04-2014) को ""जंगली धूप" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1580 में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  2. मेरी रचनाधर्मिता को आपने चर्चा मंच पर स्थान दिया इसलिए आपका हाद्धिक आभार सर जी.

    ReplyDelete

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