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Sunday, 18 May 2014

खुनी समर (कविता-7)


खुनी समर


रचे जाते है 
आज चहुँ ओर
कहीं ना कहीं
किसी दस्यु के हाथो
दुष्काण्ड ..

लगे रहते है
लगाकर घात
तिमिर पुत्र बनकर
खड़े रहते है
व्याध्र !

मंदिर और मस्जिद के बीच
हिन्दू- और मुसलमान के बीच
खोद रहे है खाइयाँ
पनप रहे है
नित नये समर.

फ़ैल रहा है  जिनसे
हलाहल
 दिग-दिगन्तो में
जो गाद रहा है
वकृ  के पंजे..

बंदिनी बन रही है
फिर से
काले स्याह
आतंक के तिमिर कारा  में.
आज स्वतन्त्रता .

फ़ैल रहा है
आज
मनुज भक्षी
मनुजो के ही  हाथों
ये खुनी समर...!!
*********************
(c)  तरुण कु. सोनी "तन्वीर"


4 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (19-05-2014) को "मिलेगा सम्मान देख लेना" (चर्चा मंच-1617) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

    ReplyDelete
  2. सादर प्रणाम सर जी,
    चर्चा मंच पर मेरी रचनाओं को सम्मिलित करने के लिए आपका हार्द्धिक आभार.

    ReplyDelete

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