हार्द्धिक स्वागत

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आपका अपना - तन्वीर

कविताएं

(C)सर्वाधिकार सुरक्षित ...





1. रेखाचित्र इन्सान



एक चित्रकार

हर रोज

बनाता है, मिटाता है,

अनगिनत रेखाचित्र

मगर वह कभी उनमें

भरता नहीं है रंग।

वह उन रेखाचित्रों की

कोरी हथेलियों में बिछा

रेखाओं का जाल

उन रेखाचित्रों को

उनमें स्वयं रंग भरने हेतु

छोड़ देता है इस धरा पर।



कुछ रेखाचित्र

तय कर अपना लक्ष्य

परिश्रम के द्वारा

सफलता प्राप्त कर

स्वयं में रंग भर

बना लेते है

अपनी जिन्दगी को

रंगीन, हसीन,

तो कुछ रेखाचित्र

भाग्य भरोसे बैठ

जिन्दगी भर हार कर

एक दिन फँसकर

उन रेखाओं के जाल में

मिटा जाते है

स्वयं अपना अस्तित्व।



उस चित्रकार को

“ विधाता “

और उन रेखाचित्रों कों

इन्सान कहते है।
****************** 


2. जीत

मात्र दो अक्षरो का संयोग है
’जीत’।
छोटा है मगर
बड़ा ही अद्भुत शब्द है ’जीत’।
सारी दुनिया को यह
अपने पीछे भागता है
छुड़ा कर
 निशा
दिवस से
बढ़ाता है ’प्रीत’।
हर कोई पाना चाहता है इस को
चाहे वह राजा या रंक हो
या हो स्वयं ’अभिजीत’।
पर यह सबके हाथ नहीं आता
ऐसा भी नहीं है
कि यह पकड़ा नहीं जाता।
इसे तो वही कर्मवीर पाता है
जो आशा/निराशा
सफलता/असफलता
सुख/दुःख से परे हट
निरन्तर अपने कदम
मंजिल की ओर बढ़ता है।
अपने लक्ष्य को तय करने में
लगन लगाता है।
एक दिन वही कर्मवीर
जीवन की हर बाधाओं
तमाम असफलताओं
को पार कर पाता है।
जाता है जीत ।
****************

3 . कविता

टुट चुका है आज
सब कुछ
जो कुछ भी था
अब तक
मेरे भीतर!
बचा है अगर कुछ
तो बस.....
चलती-फिरती जिन्दा लाश
पेट्रोल की भांति
जलता रक्त
और
वेदना का धुआँ छोड़ती
श्वासे 
और
दबी जुबाने से
सिसकियाँ भरती
आवाजें !!
बस.....अब यहीं बचा हैं
मेरे भीतर..
और 
कह सकते हो
मेरी इन्हीं
गुंगी-बहरी-सी
सिसकियों कों
तुम!
कविता !!!
*************

 4. स्वर्णिम इतिहास

शब्दों की चित्कारों में
की जाती हैं
आज
किसी-न-किसी
धर्म की तलाश ।
भरी जाती है गोद
धरती माँ की
उसकी ही सन्तानों के
नर-शिशु कंकालों से
और
ढो दी जाती है
आतंकवाद के कांधों पर
मानवता की लाश

पैदा कर दी गई
आज
चहुँ और
(भयाक्रांत करने हेतु)
युद्धों की विभीषिकाएँ 
धरती-पाताल हो या आकाश ।

अब कभी-कभी ही,
कहीं-कहीं ही,
सुनाई देते है,
आरती और अजानों के स्वर ।

शंखनाद की जगह
गुंजता है
चित्कारों का गुंजन
और
जलता दिखाई देता है
गिरजाघर में जलती
मोमबत्तीयों सा
हर शहर।

क्या यहीं होगा ?
कल हमारा स्वर्णिम इतिहास !!!
*******************

5 महान


उस इन्सान की इबादत,
उसकी दुआओं का
फल हूँ मैं

जिसने मुझे बनाया है,
उसकी छाया,
उसका प्रतिरूप हूँ मैं

वो अथाह सागर हैं,
महज्
एक कतरा ही हूँ मैं

फिर क्यूँ ?
समझते हो मुझे महान !

महान ! मैं नहीं,
वो इन्सान हैं
 जिसकी सन्तान हूँ मैं  ।।
*********************
 
6. महाभारत

समरक्षेत्र से भाग गया
कलियुगी धनुर्धर
छोड़ के अपना तरकस
ढीले पड़े हैं उसके
 धनुष के सारे अन्तस्तल में 
    वह्नि के शर ।        

लुटती रह गई बीच सभा में
द्रोपदी!
देखता रह गया
होकर वो निर्लज्ज।

कर लिया है उसने धारण,
निर्लज्जता का तिमिरयुक्त वसन।

भूल गया उपदेश
श्री कृष्ण के
बह गया वो
अकर्मण्यता-विलासिता
और वासना के सागर में।

इसीलिए
नहीं रचा जाता है
धर्म युद्व के लिए
अब फिर से
कोई ’महाभारत’।
******************


7. विचलित जिन्दगी

पानी पर तैरती
कागज की नाव
या हवा में उड़ते
चिड़िया के नन्हें से
पंख की तरह
भ्रमित है / विचलित है
ये जिन्दगी मेरी

कभी रूकती है
कभी चलती है
कभी-कभी
संघर्ष की लहरों में
गम के भंवर में
लहरा कर यूं फंस जाती है।

जैसे काँटे में मछली फंसती जाती है।

कभी-कभी
ये जिन्दगी मेरी
किनारे पर आकर
पुनः
गन्तव्य की ओर लौट जाती है ।

जैसे कुछ भूल आई हो
इस स्वप्नील संसार में।
                                                                            
शायद !
ये मोह-माया के
जाल में फँस गई है।
**************
(स्वप्नीलः- काल्पनिक अथवा सपने जैसी)
*************
  
                                                                                   
                                           
8.आओ प्रिये! आओ

आओ प्रिये ! आओं
फिर रात ढली
फिर चाँद पुकारे
ज्यों रोशनी को
चिराग तरसे
  यों तुम्हारी याद में
नैन बरसे।।

आओ प्रिये ! आओ
दिल की हर धड़कन
तुम्हें पुकारे ।।

तुम्हारी छुअन से मिलती
नई चेतना मुझको ।
                                           
  नेह में डूबी हुई
नई प्रेरणा मुझको ।
वही चिर-परिचित सम्बल,
वही तुम्हारा अहसास,
और सम्वेदना
आज भी
दिल में महफूज है
आओ प्रिये ! आओ
मेरी सम्वेदना
                             तुम्है पुकारे ।।                           

शब्द सुगन्ध औ स्पर्श की
कल्पना में नहाई रोशनाई
और रात के धुंधलके में
चाँदनी की भाँति
प्रिये ! मुझे तुम्हारी जरूरत है
आओ प्रिये ! आओ
श्वासों का नेह-बन्धन
तुम्हें पुकारे ।।
आओ प्रिये! आओ.......।।
*********************
                                         






3 comments:

  1. शुक्रिया संजय जी, हार्द्धिक आभार

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  2. बहुत सुंदर!!!! अवर्णनीय प्रशंसा आपके लिए !!!

    ReplyDelete

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