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आपका अपना - तन्वीर

आलेख


                                   1.     पुरूषार्थी बनो
                    
                         जिन खोजो तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।
      अर्थात जिसने गहरे पानी में उतरकर खोज की है, उसे मोती अवश्य मिले हैं।

                 यानी जो इंसान अपने लक्ष्यों को बड़े गहरे मनोयोग से तलाशता है। उन्हें पाने को कठोर परिश्रम करता है। एक नें एक दिन उसे अपनी मेहनत का प्रतिफल अवश्य मिलता है।किन्तु जो डूबने के भय मात्र से जल की ऊपरी सतह पर ही हाथ-पांव मारता है। तैरने के लिए परिश्रम नहीं करता है। अर्थात बड़े लक्ष्यों को पाने की कोरी कल्पनाएं ही करता रहता है। उस इंसान को कभी सफलता रूपी वो बेशकीमती मोती नहीं मिल पाता है, जो उस इंसान को एक नया मुकाम देता है। ऐसा नहीं है कि उसे कुछ भी नहीं मिलता है। उसे भी मिलता है। किन्तु वही जो जीतने वाले छोड़ देते हैं। जिनकी अहमियत मात्र भोजन करने के बाद उस झूठन जितनी ही होती है, जो भोजन करने वाला छोड़ देता है।
                    इंसान का अपने जीवन के प्रति दृष्टिकोण स्वयं के सामर्थ्यनुसार निर्धारित करता है एवं मानव जीवन पर मात्र दो प्रकार के दृष्टिकोण ही लागू होते हैं। पहला भाग्यवादी दृष्टिकोण दूसरा पुरूषार्थी दृष्टिकोण। जो महज भाग्य पर भरोसा करतें, कर्म पर नहीं, वो मनुष्य भाग्यवादी है। और जो भाग्य पर कम और कर्म पर अधिक भरोषा करता है, वह मनुष्य पुरूषार्थी है। जो भाग्यवादी है, वह कायर है। वो संघर्ष से डरता है। उसे अपने प्राण अत्यधिक प्रिय लगते हैं। वो जीवन का खतरा उठाने में झिझकता है। वह संघर्ष की हर स्थिति में पलायन कर जाता है।
                 
   अक्सर कायर व्यक्ति ये निष्कर्ष निकाल लेता है कि जीवन में जो कुछ भी उपलब्धियां मिलती है, वो कर्म से नहीं सिर्फ भाग्य से ही मिलती है। इसी कारण भाग्यवादी इंसान सअैव जीवन के हर क्षेत्र में असफल रहता है।

              किन्तु जो पुरूषार्थी है, वो वीर है। उनकी हर बातें भाग्यवादी इंसान के विपरीत अपने वीरत्व, अपनी शक्ति एवं साहस केे बलबूते पर जीवन के हर संग्राम में कूद पड़ता है। वह अपने जीवन की तनिक भी चिन्ता न कर, अपनी आन-बान-सान मिटने के लिए तत्पर रहता है।
अपने वीरत्व के बलबूते पर वो उन उपलब्धियों (लक्ष्यों) को भी प्राप्त कर लेता है, जो प्रायः दिखने और सोचने में असंभव से लगते है। वीर, जीत कर भी जीतता है और हार कर भी जीतता है। क्योकिं वीर पुरूष ये जानते हैं कि हाथ पर हाथ रखकर बैठने से कुछ भी प्राप्त नहीं होता है। जो कुछ भी मिलता है, वो प्राणो की बाजी लगाकर जीवन संग्राम में कूदने से ही मिलता है।

              राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा हैः-
                       प्रकृति नहीं डर कर झुकती है, कभी भाग्य के बल से।
                       सदा हारती वह मनुष्य के उधम से, श्रमजल से।।

अर्थात जीवन की उपलब्धियों का आधार पुरूषार्थ है, भाग्य नहीं। भाग्यवाद तो पाप का आवरण है, जो पाप को बढ़ावा देता है। अतः पुरूषार्थी बनो। भाग्यवादी नहीं।

               याद रखेः-  जो समय को दे चुनौती वीर होते हैं,
                              मृत्यु से खाते न भय, रणधीर होते हैं।                                                                                                  
                           देश रजनीज शीश पर चन्दन समझ धरते,
                               सत्य वे ही देश की तकदीर होते हैं।
                                           ****************

                                   2. परिवर्तन ही जीवन है

                   हमारा ये सांसारिक जीवन ओस की बूदों की तरह है। जो चन्द क्षणो के लिए अस्तित्व में रहता है। और चन्द क्षणों बाद ही पुनः प्रकृति में विलिन हो जाता है। इस सुन्दर काया को जिसे हम अनमोल समझ रहे हैं। इसे एक न एक दिन खाक में (पंचतत्व) में विलीन होना हि पड़ेगा।तो क्यों ना हम कोई ऐसा काम करें, जिससे समाज व राष्ट्र का भला हो और जिसे जमाना याद करें।

               जैसे हमें हमारे पूर्वजों ने बहुत कुछ दिया है। घर-परिवार, जमीन-जायदाद, और सुसंस्कृत सभ्रांत समाज आदि। जो आज हमारी पहचान है। उन्हीं की भांति हमें भी हमारी आने वाली पीढ़ी को कुछ न कुछ देना ही होगा। किन्तु अब वो जमाना नही रहा की हम हमारे पूर्वजों द्वारा बनाये गये उन पुराने रीति-रिवाजों का पूर्णतया निर्वाह सकें।

             आज इस इक्कीसवी सदी में बढ़ती जनसंख्या, मंहगाई, नित नई तकनीकों और प्रतिस्पद्धांओं के हम उस पुरानी लीक पर चलकर कभी उन्नति नहीं कर सकते है। उन पुरानी तकनीकों के आधार पर हम अपने कुल, समाज व राष्ट्र को नई दिशा नहीं दे सकते है।

            जिस प्रकार प्रकृति का श्रृंगार सदा ताजा खिले सुगन्धित पुष्पों, वृक्षों, लताओं आदि से होता है और वे ही पृथ्वी के यौवन को पतझड़ की नीरसता से दूर कर नई नवेली दुल्हन की भांति सजाती-सवांरती है। अर्थात समय परिवर्तन के साथ ही प्रकुति में भी परिवर्तन होता है।
ठीक इसी प्रकार हमें भी परिवर्तन को अपनाना होगा।                                                                       
              पुरानी तकनीकों को छोड़कर नई तकनीकों को छोड़कर नई तकनीकों का विकास करना होगा। घर-परिवार व समाज में प्रेम-एकता सौहार्द व  सदभावना का संचार करना      
 होगा। माहौल बनाना होगा। एक दूसरे के प्रति भाईचारे की भावना पैदा करनी होगी। परस्पर सहयोगी बनाना होगा। परिवर्तन को अपनाना होगा।

                            तकि हमारा, समाज व राष्ट्  सबका उत्थान हो सके। परिवर्तन तो समय प्रकृति व मानव जाति का एक अटल नियम है जिसका निर्वाह हमें सोच समझ कर करना चाहिए। ऐसा नही ही हम परिवर्तन की दौड़ में अंधे में होकर अपने मौलिक कर्तव्य भी दर किनारे कर दे। यह सही है कि नई वस्तु को प्राप्त करने के लिए कुछ हद तक पुरानी वस्तुओं को त्यागना अवश्य  पड़ता है, जो कि आज की स्थिति में अप्रासंगिक है, केवल उन्हीं वस्तुओं का मोह छोड़ना आवश्यक हैं।
                         आधुनिकता की होड़ में अपने सांस्कृतिक व पारिवारिक कर्तव्यों को त्यागना  अकर्मण्यता व मूर्खता ही है। इससे हमारा स्वयं का ही पतन होता है। इसलिए हमें  यह स्मरण रखना जरूरी है की हमारी ये मानव देह एक जलती हुई मशाल है। जो निरन्तर कुल, समाज, राष्ट्र व सम्पूर्ण विश्व को अपने प्रकाश से आलोकित कर उसका मार्गदर्शन करती है। 

                       अतः हमारा ये जीवन निष्प्रायोजन नहीं होना चाहिए। समाज के लिए हमें कर्मठ, ओजस्वी , सहायक परिवर्तनशील व अभिलाषी होना चाहिए। ताकि हमारी इस मशाल रूपी देह के प्रकाश से समाज व राष्ट्र आलोकित हो सके और हमारा ये मानव जीवन सार्थक हो सके।
अतः याद रखेंः- जो उत्कृष्ट प्रतिमाएँ होती है वे ही अनिवार्यत पहले से ही चली आ रही लीक को तोडती है और अपनी नई लीक बनाती है नया इतिहास लिखती है।
अर्थात परिवर्तन ही जीवन है।
 
                     लीक-लीक गाडी चलै, लीक ही चले कपूत।
                       ये तीनो उल्टे चलै, शायर, सिंह, सपूत।।
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                      3.-  सफलता कैसे मिलती है.

जिन्दगी हर मंजिल से पहले एक रास्ता है, जिस पर हमें अपनी सांस तक निरन्तरता ही   वास्तविकता सफलता है।  अतः सफलता को कभी भी मंजिल नहीं समझना चाहिए। क्योंकि सफलता केवल एकमात्र मंजिल नहीं बल्कि हमारे पूरे होते लक्ष्यों और विस्तृत होते सपनों की एक श्रृंखला है। सफलता को मंजिल तभी कहा जा सकता है, तब हम किसी मुकाम पर जाकर रूक जाएं और अपने आपको किसी एक सीमा में बांध दें।
अपने आपको एक निश्चित सीमा में बांधकर मार्ग में बैठ जाने वाले कभी आसमाँ की बुलंदी नहीं छू पाते है। ऊँचाई तक पहुचने व लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निरन्तर चलना जरूरी है।

                   “रॉल्फ वाल्डो ईमरसन“ के अनुसार:- इस संसार में वही लोग अपने लक्ष्यों की ऊँचाइयों को छूने में सफल हुए है, जिन्होने एक के बाद दूसरा, तीसरा कदम अपनी मंजिल की ओर निरन्तर अविराम बढाया है। पहला कदम तो हर कोई उठा लेता है किन्तु दूसरा व तीसरा कदम वे ही लोग उठा पाते  हैं। जो अपने लक्ष्यो के प्रति संकल्पबद्ध होते हैं। पहले कदम के पश्चात दूसरा तीसरा कदम उठाने से ही पहले कदम का मूल्य बढ़ता है।“
            
      ज्यादातर व्यक्ति एक दूसरे से आगे निकलने की होड में लगे रहते हैं, जिनमें से बहुत कम व्यक्ति सफल हो पाते हैं। ऐसी सफलता वास्तविकता सफलता नहीं होती है बल्कि सफलता के नाम पर बेईमानी होती है।
             
        इनके विपरीत कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो बिना किसी प्रतिस्पर्धा के खुद से ही आगे निकलने, ऊपर उठने के लिए प्रयासरत रहते हैं। वे ही अपनी ही कमियों/गलतियों को सुधारकर अपने ही रिकार्ड तोड़ते है। ऐसे लोगों को अपने मान-सम्मान, धन पद से कोई लेना-देना नहीं होता है। ऐसे लोग सफलता को किसी पैमाने से मापने की बजाय कर्मपथ पर निरन्तर आगे बढ़ने की लगन लगाते हैं।
            वास्तव में सफलता कभी भी ऊँचाई से ही नहीं मापी जाती है। इसे मापने के लिए हमें अपने अतीत को अपनी असफलताओं को देखना पड़ता है। हम कितनी बार असफल हुए है, कितनी बार हम गिरकर उठ खड़े हुए हैं और कितना हमने सफलता के लिए संघर्ष किया है।

क्योंकि जहाँ संघर्षों का घर्षण होता है, वहीं एक दिन सफलता की अग्नि प्रज्ज्वलित होती है। और गिरकर बार-बार उठने की शक्ति ही सफलता का मार्ग तय करती है।

“स्वामी विवेकानन्द के अनुसार- यदि हम मंजिल पाने में सहस्त्र (हजार) बार भी असफल क्यों न हो जाएं, फिर भी हमें एक प्रयास और करना चाहिए।“
यह अटल सत्य है कि “निरन्तर परिश्रमरत होकर अपने लक्ष्यों के प्रति प्रयास करने वाला व्यक्ति हमेंशा असफल नहीं हो सकता है। वो अपने परिश्रम के बल पर अपनी सफलता प्राप्त करके ही दम लेता है। अतः हमें बिना हार-जीत की परवाह किये निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाते रहना चाहिए। परिश्रम करना चाहिए। असफलताओं से निराश होने के बजाए उन्हें अपनी सफलता का पायदान बनाने का प्रयास करना चाहिए।

            यह सदैव याद रखें-कि “असफलता ही सफलता ही जननी है।                                                     
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